March 10, 2018 ज़िंदा नहीं आता हमारी डायरी में शब्द शर्मिंदा नहीं आता, कहाँ तक हद है ये सब सोचकर बंदा नहीं आता, महज़ गालों को चूमा था अभी भी इक नशा सा है, अगर होंठो तलक जाता तो फिर ज़िंदा नहीं आता। ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह।