Skip to main content

Posts

Featured

ज़िंदा नहीं आता

हमारी  डायरी  में  शब्द  शर्मिंदा  नहीं  आता, कहाँ तक हद है ये सब सोचकर बंदा नहीं आता, महज़ गालों को चूमा था अभी भी इक नशा सा है, अगर होंठो तलक जाता तो फिर ज़िंदा नहीं आता। ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह।

Latest posts

तेरी नज़रे

परिंदा

मोहब्बत विष नहीं होता

बिना तुम्हारे