बिना तुम्हारे
बिना तुम्हारे
बिना तुम्हारे सुबह अवध की शाम सरीखी लगती है,
बिना तुम्हारे पूरी दिल्ली फीकी फीकी लगती है।
बिना तुम्हारे चांदनी चौक में भी पग सूने लगते हैं,
बिना तुम्हारे गम के बदल छाती छूने लगते है।
बिना तुम्हारे हम ने छत पे आना जाना छोड़ दिया,
तेरे छत पे तकने का हर एक बहाना छोड़ दिया,
बच्चे कहते है चाचू क्यूँ पतंग उड़ाना छोड़ दिया।
बिना तुम्हारे नाविक काका ने बाते दोहराई हैं,
जब भी जाता हूं कहते है बिटिया क्यूँ नहीं आयी है?
बिना तुम्हारे ये बारिश की बूंदे हाथ जलाती है,
और तुम्हारा नाम बुलाकर भाभी मुझे चिढ़ाती है।
बिना तुम्हारे अबकी फागुन गाल गुलाबी नहीं हुआ,
बिना तुम्हारे अपना लहज़ा कभी नबाबी नहीं हुआ।
अभी कई वादे बाकी थे उन वादों को तोड़ो भी,
बिना तुम्हारे कितने शिकवे.......खैर हटाओ छोडो भी।
ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह।


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