परिंदा
ये डाल है झुकी हुई, उठा हुआ है आसमां,
फुदक फुदक के वो परिंदा तक रहा है आसमां,
वो अपना साथी आसमां में देख कर उछल पड़ा
उम्मीद है उसे कि वो भी चूम लेगा आसमां।
भले ही ये हवाएं पर क़तर दे अपनी धार से,
भले ही ये कुहासे उसको ला पटक दे भार से,
परिंदा बिन परों के भी तो घूम लेगा आसमां,
उम्मीद है उसे कि वो भी चूम लेगा आसमां।
भले ही उसके ताक में शिकारी हो या बाज़ हो,
भले ही उसकी आँख में सधी हुई कमान हो,
वो बाज़ को भी देके धोखा, ढूंढ लेगा आसमां,
उम्मीद है उसे कि वो भी चूम लेगा आसमां।
ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह



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